अफसाना
अगर अपने ही अपने होते
तो हम बेगानों को अपना क्यों बनाते
जब अपने ही अपने न बने तो
हम बेगानों से आशा क्यों बंधाते
हुए जब अपने यू बेगाने
तब देखा अपनों का बेगानापन
ओर बने बेगाने जब अपने
तब जाना केसा होता है बेगानों का अपनापन
अब हालात यह है की
अपने-अपने न बन सके न बेगाने ही अपने बन सके
इन दोनों के बीच में कोई भी ऐसा न रहा
जिसे हम अपना कह सके
ऐ ऊपर वाले अजब तेरा अफसाना है
न समझ सके आज तक हम
की तुम ज़माने से हो की
तुमसे यह जमाना है II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
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