Tuesday, April 27, 2010

                          अफसाना

अगर अपने ही अपने होते
   तो हम बेगानों को अपना क्यों बनाते
    जब अपने ही अपने न बने तो
         हम बेगानों से आशा क्यों बंधाते

हुए जब अपने यू बेगाने
 तब देखा अपनों का बेगानापन
   ओर बने  बेगाने जब  अपने
      तब जाना केसा होता है बेगानों का अपनापन

अब हालात यह है की
  अपने-अपने न बन सके   न बेगाने ही अपने बन सके
     इन दोनों के बीच में   कोई भी ऐसा न रहा
       जिसे हम अपना कह सके

 ऐ ऊपर वाले अजब तेरा अफसाना है
  न समझ  सके आज तक हम
    की  तुम ज़माने से हो की
       तुमसे  यह  जमाना है  II

लेखक प्रवीण चंदर झांजी   

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