विदाई की बेला
मत करो शिकवा की
अब विदाई की बेला है
जब आई थी मिलन की बेला
तब थे गुलदस्ते हमारे हाथ में
चलते चलते साथ साथ
मुरझा गई सब फूल
सूख गई सब पतिया
बिखरे गए है कांटे सब तरफ अब राह में
होकर लहू लुहान इन काँटों से
जो थे बिखेरे तुमने मेरी राह में
कहते है हम फिर भी की भूल जाओ सब कुछ
कयोंकि यह विदाई की बेला है
सदियों से समय के सागर में बहते
अनगनित भंवरो के तूफ़ान को सहते
आखिर हम इस जनम में आन मिले
कुछ पल साथ रहे कुछ कदम साथ चले
फिर कुछ वक़्त साथ रहे कुछ शन साथ जिए
कुछ पल प्यार किया कुछ अघात किये
फिर भी कहते है हम छोढ़ो यह सब
कयोंकि यह विदाई की बेला है
कयोंकि बिछढ़े जो अब
जाने फिर कब हो मुलाकात
चल देंगे राह अपनी अपनी
होकर वक़्त की धार पर सवार
जाने हम पहचाने या न पहचाने
न जाने याद रहे न रहे हमें हमारी ये मुलाक़ात
इसी लिए कहते है हम रहने दो शिकवे अब
कयोंकि अब तो यह विदाई की बेला है II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
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