Sunday, April 25, 2010

                                     विदाई की बेला
मत करो शिकवा की
   अब विदाई की बेला है
      जब आई थी मिलन की बेला
          तब थे गुलदस्ते हमारे हाथ में

चलते चलते साथ साथ
   मुरझा गई सब फूल
      सूख गई सब पतिया
         बिखरे गए  है कांटे सब तरफ अब राह में

होकर लहू लुहान इन काँटों से
   जो थे बिखेरे तुमने मेरी राह में 
     कहते है हम फिर भी की भूल जाओ सब कुछ 
       कयोंकि यह विदाई की बेला है 

सदियों से समय के सागर में बहते 
    अनगनित भंवरो के तूफ़ान को सहते 
      आखिर हम इस जनम में आन  मिले 
        कुछ पल साथ रहे कुछ कदम साथ चले 

फिर कुछ वक़्त साथ रहे कुछ शन साथ जिए
  कुछ पल प्यार किया कुछ अघात किये
    फिर भी कहते है हम छोढ़ो यह सब
      कयोंकि  यह विदाई की बेला है

कयोंकि बिछढ़े जो अब
  जाने फिर कब हो मुलाकात
  चल देंगे राह अपनी अपनी
     होकर वक़्त की धार पर सवार

जाने हम पहचाने या न पहचाने
  न जाने याद रहे न रहे हमें हमारी ये मुलाक़ात
   इसी लिए कहते है हम रहने दो शिकवे अब
     कयोंकि अब तो यह विदाई की बेला है II

         लेखक प्रवीण चंदर झांजी

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