Friday, May 28, 2010

लक्ष्य
इंसान है कि रहता भागता
  बनकर बालक सा उन
    अतृप्त इच्छाओ, वासनाओ, त्रिष्नाओ के पीछे 

उढ़ रही है जो संसार मै बनकर
  रंग बिरंगी तितलिया आती है लुभाने हमें 
    जीवन के हर मोढ़ पर रहते है हम जब तक जीते 

इंसान है कि मानता ही नहीं कि
  हो जाये चाहे गीली कितनी ही
    ये रंगीन बालू दुराचार और भ्रष्टाचार कि
   
यह बचा नहीं पायेगी उसको
  जब चलेगी हवा जाग्रति  कि
    और आंधी बदलाव और सदाचार कि

मानव है की जान कर भी नहीं चाहता जानना कि 
   झूठ और फरेब केक्टस पर लगे फूल (गुलाब) कि तरह 
     लुभाते है हमें चाहे कुछ पल के लिए  

मगर जब चमकती है सत्य कि धूप
  तब यह फूल और कांटे बचा नहीं पाते खुद को
    और जाते है जल सूखी घास कि तरह

हें मानव बनना है तो बन
  वो फूल सयम और धीरज का  ताकि
    यह तितलिया आये और मंडराकर चली जाये

बनना है तो बन जीवन  मै वो
  चट्टIन सिदान्तो और विश्वास की ताकि वो
    रंगीन बालू लहरों के साथ आये और  टकराकर वापिस  चली जाये 

और अगर चाहता है  बनना  तो
  बन वो पेढ़ घना आम का दे  आश्रय सुरक्षित  पंछी को
   दे हमेशा छाया पथिक को साथ में दे फल मीठे आम का
   
जब हो जीवन की शाम
  और  गिरे  तो ऐसा गिरना  
   की तेरा गिरना व्यर्थ न जाये

 भले ही जल जाये तू पर
   मिल जाये ताप ठण्ड में किसी गरीब को
     और बन जाये भोजन किसी  की शाम का II


लेखक प्रवीण चंदर झांझी
     
 
  मानव श्रंखला

लो आज फिर कोई रिश्ता टूट गया
  आज फिर कोई बंधन छूट गया
    है  टूटता जब कोई रिश्ता
       तो बदलकर जाता है
          परिभाषा कई रिश्तो की

टूटता है जब धागा किसी जाल का
  तो कर जाता है ढीला
     जाल की  हर गाँठ को
     धागों के बीच ढीली पढ़ती यह गांठे
        बदल देती है जाल  ही के आकार  को

कसकर बंधा यह जाल
  टूटते ही इस गाँठ के
    देखो अब अपना आकार
      ही बदल गया कैसे पढ़कर ढीला 
        होकर निराश बेजान स लटक गया
    
अब कभी कभी चलती 
   कोई हवा का झोंका
     कुछ पलो के लिए शायद मिला दे
       इन बचे हुए धागों को वरना
          इनके रिश्तो का तो नाम ही बदल गया है 

  धागे टूटते रहते है,
     बंधन छूटते रहते है
       यह टूटते हुए धागे
             समझाते है हमें  असलियत
               इन रिश्तो के जाल की
        
कितने झूठे थे यह बंधन
   जिसे ढोते रहे हम तह उम्र 
     समय की हवा के  एक
       हलके से झोके ने
       इन बन्धनों को बिखेर दिया
          

आओ अब फिर उठे  
  फिर चले नए सिरे से
  बांधे  इन टूटते बन्धनों के धागे को
    जो ढीले पढ़कर टूट गए है 
      शायद ऐसी  ही किसी गाँठ से छूट गए है   
   
इस बार लेकर चले हम  साथ
     उन धागों को भी  जो
      समय की आंधी मै  हमसे  कही छूट गए है
         मानाले उन अपनों को जो 
          जीवन के किसी मोढ़ पर हमसे रूठ गए है  
        

अब न बनाये हम जाल
   कोई झूठे रिश्तो का
     जो एक हवा के झोके से टूट जाये  
      अब न डाले ऐसी गांठे  जो
        एक ही झटके  मै ढीली पढ़कर छूट  जाये

  अब बढ़ना है हमें 
    मिलाकर कदम से कदम
     और मिलाकर दिल से दिल
       बुनेगे अब हम धागे सिदान्तो के
         आधार होगा सदाचार रिश्तो का 

निस्वार्थ भाव से बनाए  रिश्ते ही है असली  रिश्ते 
    स्वार्थ, अनाचार, दुराचार और व्यभिचार से दूर  
       मानवता के रिश्तो से पिरोई  और  सिदान्तो के धरातल पर खढ़ी
        सिर्फ सत्यम शिवम् सुन्दरम कि भाषा समझने वाली
          वो मानव श्रंखला ही ले जा सकती विश्व को  अपनी  मंजिल की ओर  II

                          लेखक प्रवीण चंदर झांझी

      


      
  

Sunday, May 23, 2010

                                                  भविष्य

वासनाओ की आग को
   वैराग्य कि बर्फ मै लपेटे
     चला जा रहा हूँ  मै जीवन पथ पे

है ये कौन जो  चाहता है
   तोढ़ ना इस आवरण को
     गला कर इस ठंडी बर्फ को

है कौन जो करता है कोशिश बार बार
भटकाकर मुझे मार्ग से
  नहीं जाने देना चाहता  इस जीवन नदिया के उस पार

अपने स्वार्थो मै फंसा
अपने   निजी सुखो मै धंसा है कौन  जो
  मेरी अध्यात्मिक उन्नति मै बाधा अटका रहा है

क्यों करके दुरूपयोग अपने रिश्तो का
  चाहता है लेजाना मुझे कुमार्ग की ओर
    क्यों मेरे सन्मार्ग  मै पाप के रोढ़े अटका रहा है

भटकाने को मार्ग से मुझे  
  कर लिए जमा अपने पाप उसने इतने
    मगर अभी भी अपने पुण्य वो जलाये जा रहा है

मगर जानता हूँ मै यह सच
  नहीं है त्रिष्नाओ का कोई अंत
   नहीं चाहता मै जीना झूटी आशाओ के संग

कामनाओ का यह जंजाल  है बनता
  जीवन मै अनेक  दुखो के कारणों का जाल
     फिर भी मुझमे वो कामनाओ की आग क्यों भढ़का रहा है

नहीं चाहता अब और इनमें  फंसना 
  समझता हूँ मै की अब समय है कम 
    यह जीवन है की बीतता ही जा रहा है  

अभी भी नहीं कुछ है बिगढ़ा,
  आओ ले कर हाथ में हाथ 
      मिलाकर कदमो की ताल

   आओ चले मिलकर  सत्य और धरम की राह  
     जिस ओर दूर जाने कब से खढ़ा
         एक सुंदर भविष्य बाहे फैलाये हमें बुला रहा है II

     लेखक   प्रवीण चंदर झांझी   
      
  













  

Tuesday, May 18, 2010

                    आगे

थक गया हूँ ढोते-ढोते बोझ रिश्तो का
  कहते है होते है रिश्ते इस जनम के
    परणीती पिछले कई जन्मो के रिश्तो कि

जब उब गया है मन मेरा,
  बोझिल है आत्मा मेरी
    बोझ से इस जनम के रिश्तो के  

तो क्या हुआ होगा और
   क्या हुआ होगा अंजाम इन रिश्तो का 
     बीते हुए कल मै या आने वाले कल मै 

सिकुढ़ गया है चेहरा मेरा 
  ये नकली मुस्कराहट देते-देते 
   बोझिल है पलके मेरी
      इन आंसुओ को पीते-पीते  

पक गए है कान मेरे
  झूठ सुनते सुनते
   सूख गई है जुबान मेरी
     झूठा शिष्टाचार करते करते

इन सब का गुनाह गार है ये सांस
   जो बेकार ही आता जाता है
    यह सांस जो आता है
     तो मुझको और थका जाता है

हें प्रभु अब जो हुआ सो हुआ
  अब आगे इसे  मत दोहराने देना
   अब अगले पिछले जनम का हिसाब
    इस जनम मै मिटा देना

आगे देना मुझे
  एक सुंदर, निर्मल, सुविचारो वाली
   बिना शरीर कि एक  आत्मा जो
    ले जाये मुझे आपके उस दिव्य तेज कि और II

लेखक  प्रवीण चंदर झांझी
 
वो सुबह

मेरी ख़ामोशी ही मेरी जुबान है
    वर्ना बहुत बोलकर भी अक्सर
      कुछ कह नहीं पाते लोग,

मेरी सादगी ही मेरी पहचान है
  वर्ना बहुत कुछ कर के भी
    पहचान नहीं बना पाते लोग,

मेरी नज़र ही मेरी उदासीनता का
निशान है वर्ना बहुत रोकर भी
              जीवन से  मुह नहीं मोढ़ पाते लोग,

मेरे कर्म ही मेरे वैराग्य कि पहचान है
  वर्ना पहनकर गेरुआ भी
     दुनिया से मुह नहीं मोढ़ पाते लोग,

है परेशानी नहीं लोगो कि के दुखी है वो 
     अक्सर दुसरो के सुख से 
       भी दुखी हो जाते है लोग, 

अपने गरेबान कि धूल पर
   नहीं नज़र डालते लोग 
     दूसरो के घरो मै अक्सर झांकते है लोग

होता है मतलब जब अपना
   तो दूंढ लेते है पाताल मै भी
   वर्ना सामने होकर भी नहीं पहचानते लोग,

मरने पर दूसरो के जताते है शोक
  आनी है बारी भी अपनी
   यह जानकर भी नहीं जानना चाहते लोग

देखकर कालिमा इस जीवन कि रात कि
  क्यों घबरा जाते है, होगी फिर नई सुबह
     यह क्यों भूल जाते है लोग II

लेखक प्रवीण चंदर झांजी
  

Sunday, May 9, 2010

                      पहला और आखरी सत्य

मेले में घर बनाना चाहते हो
  रौशनी से आंगन सजाना चाहते हो
    ओर चाहते हो की बनी रहे यह रौनक हमेशा
       खुशिओ की रेत से आँचल भरना चाहते हो

कभी सोचा है की
 है यह मेला चार दिन का
   न फिर होंगे तम्बू, न होगी  रोशिनी
    न होंगी महफ़िल न होगी रौनक

चल देगा कारवां जिन्दगी
  जब छोढ़ कर तनहा तुझको 
    खढ़ा होगा अकेला जब तू
      जिन्दगी के आखरी छोर पे 

जानते है सब ये,
   मानते है सब ये
  जानकार भी मानकर भी
        नहीं चाहते समझना ये
   

न समझकर इसको
 बच पायेगा क्या कोई इस से
     है जीवन  का यह भेद  ऐसा
      उलझा हुआ है हर कोई इसमें

जिस दिन इन्सान यह समझ जायेगा
   झूठ, फरेब अपने पराये का भेद वो  भूल जायेगा
      समझ जायेगा यह पहला ओर आखरी सत्य
       की अकेला आया है अकेला ही जायेगा II

               लेखक प्रवीण चंदर झांजी  

Tuesday, April 27, 2010

                          अफसाना

अगर अपने ही अपने होते
   तो हम बेगानों को अपना क्यों बनाते
    जब अपने ही अपने न बने तो
         हम बेगानों से आशा क्यों बंधाते

हुए जब अपने यू बेगाने
 तब देखा अपनों का बेगानापन
   ओर बने  बेगाने जब  अपने
      तब जाना केसा होता है बेगानों का अपनापन

अब हालात यह है की
  अपने-अपने न बन सके   न बेगाने ही अपने बन सके
     इन दोनों के बीच में   कोई भी ऐसा न रहा
       जिसे हम अपना कह सके

 ऐ ऊपर वाले अजब तेरा अफसाना है
  न समझ  सके आज तक हम
    की  तुम ज़माने से हो की
       तुमसे  यह  जमाना है  II

लेखक प्रवीण चंदर झांजी