वासनाओ की आग को
वैराग्य कि बर्फ मै लपेटे
चला जा रहा हूँ मै जीवन पथ पे
है ये कौन जो चाहता है
तोढ़ ना इस आवरण को
गला कर इस ठंडी बर्फ को
है कौन जो करता है कोशिश बार बार
भटकाकर मुझे मार्ग से
नहीं जाने देना चाहता इस जीवन नदिया के उस पार
अपने स्वार्थो मै फंसा
अपने निजी सुखो मै धंसा है कौन जो
मेरी अध्यात्मिक उन्नति मै बाधा अटका रहा है
क्यों करके दुरूपयोग अपने रिश्तो का
चाहता है लेजाना मुझे कुमार्ग की ओर
क्यों मेरे सन्मार्ग मै पाप के रोढ़े अटका रहा है
भटकाने को मार्ग से मुझे
कर लिए जमा अपने पाप उसने इतने
मगर अभी भी अपने पुण्य वो जलाये जा रहा है
मगर जानता हूँ मै यह सच
नहीं है त्रिष्नाओ का कोई अंत
नहीं चाहता मै जीना झूटी आशाओ के संग
कामनाओ का यह जंजाल है बनता
जीवन मै अनेक दुखो के कारणों का जाल
फिर भी मुझमे वो कामनाओ की आग क्यों भढ़का रहा है
नहीं चाहता अब और इनमें फंसना
समझता हूँ मै की अब समय है कम
यह जीवन है की बीतता ही जा रहा है
अभी भी नहीं कुछ है बिगढ़ा,
आओ ले कर हाथ में हाथ
मिलाकर कदमो की ताल
आओ चले मिलकर सत्य और धरम की राह
जिस ओर दूर जाने कब से खढ़ा
एक सुंदर भविष्य बाहे फैलाये हमें बुला रहा है II
लेखक प्रवीण चंदर झांझी
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