Sunday, May 23, 2010

                                                  भविष्य

वासनाओ की आग को
   वैराग्य कि बर्फ मै लपेटे
     चला जा रहा हूँ  मै जीवन पथ पे

है ये कौन जो  चाहता है
   तोढ़ ना इस आवरण को
     गला कर इस ठंडी बर्फ को

है कौन जो करता है कोशिश बार बार
भटकाकर मुझे मार्ग से
  नहीं जाने देना चाहता  इस जीवन नदिया के उस पार

अपने स्वार्थो मै फंसा
अपने   निजी सुखो मै धंसा है कौन  जो
  मेरी अध्यात्मिक उन्नति मै बाधा अटका रहा है

क्यों करके दुरूपयोग अपने रिश्तो का
  चाहता है लेजाना मुझे कुमार्ग की ओर
    क्यों मेरे सन्मार्ग  मै पाप के रोढ़े अटका रहा है

भटकाने को मार्ग से मुझे  
  कर लिए जमा अपने पाप उसने इतने
    मगर अभी भी अपने पुण्य वो जलाये जा रहा है

मगर जानता हूँ मै यह सच
  नहीं है त्रिष्नाओ का कोई अंत
   नहीं चाहता मै जीना झूटी आशाओ के संग

कामनाओ का यह जंजाल  है बनता
  जीवन मै अनेक  दुखो के कारणों का जाल
     फिर भी मुझमे वो कामनाओ की आग क्यों भढ़का रहा है

नहीं चाहता अब और इनमें  फंसना 
  समझता हूँ मै की अब समय है कम 
    यह जीवन है की बीतता ही जा रहा है  

अभी भी नहीं कुछ है बिगढ़ा,
  आओ ले कर हाथ में हाथ 
      मिलाकर कदमो की ताल

   आओ चले मिलकर  सत्य और धरम की राह  
     जिस ओर दूर जाने कब से खढ़ा
         एक सुंदर भविष्य बाहे फैलाये हमें बुला रहा है II

     लेखक   प्रवीण चंदर झांझी   
      
  













  

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