Friday, May 28, 2010

  मानव श्रंखला

लो आज फिर कोई रिश्ता टूट गया
  आज फिर कोई बंधन छूट गया
    है  टूटता जब कोई रिश्ता
       तो बदलकर जाता है
          परिभाषा कई रिश्तो की

टूटता है जब धागा किसी जाल का
  तो कर जाता है ढीला
     जाल की  हर गाँठ को
     धागों के बीच ढीली पढ़ती यह गांठे
        बदल देती है जाल  ही के आकार  को

कसकर बंधा यह जाल
  टूटते ही इस गाँठ के
    देखो अब अपना आकार
      ही बदल गया कैसे पढ़कर ढीला 
        होकर निराश बेजान स लटक गया
    
अब कभी कभी चलती 
   कोई हवा का झोंका
     कुछ पलो के लिए शायद मिला दे
       इन बचे हुए धागों को वरना
          इनके रिश्तो का तो नाम ही बदल गया है 

  धागे टूटते रहते है,
     बंधन छूटते रहते है
       यह टूटते हुए धागे
             समझाते है हमें  असलियत
               इन रिश्तो के जाल की
        
कितने झूठे थे यह बंधन
   जिसे ढोते रहे हम तह उम्र 
     समय की हवा के  एक
       हलके से झोके ने
       इन बन्धनों को बिखेर दिया
          

आओ अब फिर उठे  
  फिर चले नए सिरे से
  बांधे  इन टूटते बन्धनों के धागे को
    जो ढीले पढ़कर टूट गए है 
      शायद ऐसी  ही किसी गाँठ से छूट गए है   
   
इस बार लेकर चले हम  साथ
     उन धागों को भी  जो
      समय की आंधी मै  हमसे  कही छूट गए है
         मानाले उन अपनों को जो 
          जीवन के किसी मोढ़ पर हमसे रूठ गए है  
        

अब न बनाये हम जाल
   कोई झूठे रिश्तो का
     जो एक हवा के झोके से टूट जाये  
      अब न डाले ऐसी गांठे  जो
        एक ही झटके  मै ढीली पढ़कर छूट  जाये

  अब बढ़ना है हमें 
    मिलाकर कदम से कदम
     और मिलाकर दिल से दिल
       बुनेगे अब हम धागे सिदान्तो के
         आधार होगा सदाचार रिश्तो का 

निस्वार्थ भाव से बनाए  रिश्ते ही है असली  रिश्ते 
    स्वार्थ, अनाचार, दुराचार और व्यभिचार से दूर  
       मानवता के रिश्तो से पिरोई  और  सिदान्तो के धरातल पर खढ़ी
        सिर्फ सत्यम शिवम् सुन्दरम कि भाषा समझने वाली
          वो मानव श्रंखला ही ले जा सकती विश्व को  अपनी  मंजिल की ओर  II

                          लेखक प्रवीण चंदर झांझी

      


      
  

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