अफसाना
अगर अपने ही अपने होते
तो हम बेगानों को अपना क्यों बनाते
जब अपने ही अपने न बने तो
हम बेगानों से आशा क्यों बंधाते
हुए जब अपने यू बेगाने
तब देखा अपनों का बेगानापन
ओर बने बेगाने जब अपने
तब जाना केसा होता है बेगानों का अपनापन
अब हालात यह है की
अपने-अपने न बन सके न बेगाने ही अपने बन सके
इन दोनों के बीच में कोई भी ऐसा न रहा
जिसे हम अपना कह सके
ऐ ऊपर वाले अजब तेरा अफसाना है
न समझ सके आज तक हम
की तुम ज़माने से हो की
तुमसे यह जमाना है II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
Tuesday, April 27, 2010
Sunday, April 25, 2010
विदाई की बेला
मत करो शिकवा की
अब विदाई की बेला है
जब आई थी मिलन की बेला
तब थे गुलदस्ते हमारे हाथ में
चलते चलते साथ साथ
मुरझा गई सब फूल
सूख गई सब पतिया
बिखरे गए है कांटे सब तरफ अब राह में
होकर लहू लुहान इन काँटों से
जो थे बिखेरे तुमने मेरी राह में
कहते है हम फिर भी की भूल जाओ सब कुछ
कयोंकि यह विदाई की बेला है
सदियों से समय के सागर में बहते
अनगनित भंवरो के तूफ़ान को सहते
आखिर हम इस जनम में आन मिले
कुछ पल साथ रहे कुछ कदम साथ चले
फिर कुछ वक़्त साथ रहे कुछ शन साथ जिए
कुछ पल प्यार किया कुछ अघात किये
फिर भी कहते है हम छोढ़ो यह सब
कयोंकि यह विदाई की बेला है
कयोंकि बिछढ़े जो अब
जाने फिर कब हो मुलाकात
चल देंगे राह अपनी अपनी
होकर वक़्त की धार पर सवार
जाने हम पहचाने या न पहचाने
न जाने याद रहे न रहे हमें हमारी ये मुलाक़ात
इसी लिए कहते है हम रहने दो शिकवे अब
कयोंकि अब तो यह विदाई की बेला है II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
मत करो शिकवा की
अब विदाई की बेला है
जब आई थी मिलन की बेला
तब थे गुलदस्ते हमारे हाथ में
चलते चलते साथ साथ
मुरझा गई सब फूल
सूख गई सब पतिया
बिखरे गए है कांटे सब तरफ अब राह में
होकर लहू लुहान इन काँटों से
जो थे बिखेरे तुमने मेरी राह में
कहते है हम फिर भी की भूल जाओ सब कुछ
कयोंकि यह विदाई की बेला है
सदियों से समय के सागर में बहते
अनगनित भंवरो के तूफ़ान को सहते
आखिर हम इस जनम में आन मिले
कुछ पल साथ रहे कुछ कदम साथ चले
फिर कुछ वक़्त साथ रहे कुछ शन साथ जिए
कुछ पल प्यार किया कुछ अघात किये
फिर भी कहते है हम छोढ़ो यह सब
कयोंकि यह विदाई की बेला है
कयोंकि बिछढ़े जो अब
जाने फिर कब हो मुलाकात
चल देंगे राह अपनी अपनी
होकर वक़्त की धार पर सवार
जाने हम पहचाने या न पहचाने
न जाने याद रहे न रहे हमें हमारी ये मुलाक़ात
इसी लिए कहते है हम रहने दो शिकवे अब
कयोंकि अब तो यह विदाई की बेला है II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
Wednesday, April 21, 2010
अलविदा
जिन्दगी मत कर उदास इतना की
मै तुझसे उदास हो जाऊ
अगर मै तुझसे उदास हो गया
तो बहुत उदास हो जायगी तू
कभी बहुत चाहता था मै तुझे
पर उस शिदत से न चाह पाई मुझे तू
कभी डरता था तुझे खोने से मै
अब मेरे खोने के डर से क्यों डर जाती है तू
कुछ रही होंगी मजबुरिया तेरी कुछ होंगे स्वार्थ तेरे
वर्ना यह जानकर भी कि
नहीं रहेगा हमेशा यू साथ तेरा मेरा
न इस तरह कभी दुत्कारती हमें तू
जितना भी था साथ हमारा
काश हो जाता उसमे कुछ ऐसा
गर्व से कह पाते हम भी
क्या खूब जिए हम साथ तेरे
मिलना बिछढ़ ना तो है विधान विधि का
अफ़सोस तो है यह कि न हम खुश हो पाए तुमसे
न तुम खुश हो पाई हमसे कहते है अलविदा अब
क्योंकि छा गएहै अब यह रात के अँधेरे II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
जिन्दगी मत कर उदास इतना की
मै तुझसे उदास हो जाऊ
अगर मै तुझसे उदास हो गया
तो बहुत उदास हो जायगी तू
कभी बहुत चाहता था मै तुझे
पर उस शिदत से न चाह पाई मुझे तू
कभी डरता था तुझे खोने से मै
अब मेरे खोने के डर से क्यों डर जाती है तू
कुछ रही होंगी मजबुरिया तेरी कुछ होंगे स्वार्थ तेरे
वर्ना यह जानकर भी कि
नहीं रहेगा हमेशा यू साथ तेरा मेरा
न इस तरह कभी दुत्कारती हमें तू
जितना भी था साथ हमारा
काश हो जाता उसमे कुछ ऐसा
गर्व से कह पाते हम भी
क्या खूब जिए हम साथ तेरे
मिलना बिछढ़ ना तो है विधान विधि का
अफ़सोस तो है यह कि न हम खुश हो पाए तुमसे
न तुम खुश हो पाई हमसे कहते है अलविदा अब
क्योंकि छा गएहै अब यह रात के अँधेरे II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
Tuesday, April 20, 2010
"नित्य"
कौन कहता है की निराश हूँ मैं
न होना किसी आशा का नहीं होता निराशा
न पूरा होना किसी आशा का होती है निराशा
नहीं है आशा इस दुनिया से कोई
जिससे है उससे हुई पूरी या रही अधूरी
लगेगा पता यह मेरे मरने के बाद
फिर भला कैसे हो सकता हूँ मै निराश
कौन कहता है की उदास हूँ मैं
जब होगी आशा किसी ख़ुशी की
तभी तो होऊँगा मैं उदास
जब आशा ही नहीं
तो फिर ख़ुशी कैसी
जब ख़ुशी ही नहीं
तो फिर उदासी कैसी
कौन कहता है की बर्बाद हूँ मै
बर्बाद तो होता है वह
जो कि आबाद होता है
आबाद वह होता है
जिसके पास कुछ "नित्य" होता है
पर है कुछ इस दुनिया मै "नित्य" यहाँ
यह शरीर है हो जायेगा ख़तम मृत्यु के साथ
करम जल जायेगा भोग के साथ
तो फिर क्या है यहाँ "नित्य" किसी के पास
जब कोई भी नहीं आबाद यहाँ
तो क्यों कहते हो की बर्बाद हूँ मै
न उदास हूँ, न निराश हूँ, न बर्बाद हूँ मै
हाँ चल पढ़ा हूँ जिस पर वह आसान नहीं है राह
अब झूठ, परपंच, फरेब की दुनिया की नहीं है चाह
अब तो जाना चाहता हूँ उस ओर सब कुछ है "नित्य" जहाँ II
लेखक प्रवीण चंदर झांझी
कौन कहता है की निराश हूँ मैं
न होना किसी आशा का नहीं होता निराशा
न पूरा होना किसी आशा का होती है निराशा
नहीं है आशा इस दुनिया से कोई
जिससे है उससे हुई पूरी या रही अधूरी
लगेगा पता यह मेरे मरने के बाद
फिर भला कैसे हो सकता हूँ मै निराश
कौन कहता है की उदास हूँ मैं
जब होगी आशा किसी ख़ुशी की
तभी तो होऊँगा मैं उदास
जब आशा ही नहीं
तो फिर ख़ुशी कैसी
जब ख़ुशी ही नहीं
तो फिर उदासी कैसी
कौन कहता है की बर्बाद हूँ मै
बर्बाद तो होता है वह
जो कि आबाद होता है
आबाद वह होता है
जिसके पास कुछ "नित्य" होता है
पर है कुछ इस दुनिया मै "नित्य" यहाँ
यह शरीर है हो जायेगा ख़तम मृत्यु के साथ
करम जल जायेगा भोग के साथ
तो फिर क्या है यहाँ "नित्य" किसी के पास
जब कोई भी नहीं आबाद यहाँ
तो क्यों कहते हो की बर्बाद हूँ मै
न उदास हूँ, न निराश हूँ, न बर्बाद हूँ मै
हाँ चल पढ़ा हूँ जिस पर वह आसान नहीं है राह
अब झूठ, परपंच, फरेब की दुनिया की नहीं है चाह
अब तो जाना चाहता हूँ उस ओर सब कुछ है "नित्य" जहाँ II
लेखक प्रवीण चंदर झांझी
Wednesday, April 7, 2010
सोना
काठ बांस का बुनी
लोहे की कीलो से ठुकी
खटिया पर पढ़ा, माया से घिरा
सोना, सोना, तू करता है
सत्यम शिवम् सुन्दरम न दिखा
परमात्मा का एहसास न किया
आत्मा की आवाज़ को न सुना
देख हाढ़ मॉस के पुतले को सोहना, सोहना तू करता है
मोह माया मै फंसा दुनिया को छला
किया विश्वासघात न रब से डरा
दुनिया की रंगीनियों मै फंसा
न देख असलियत को माया के अँधेरे मै सोना, सोना करता है
आयेगा एक दिन,
जब तू होगा सांस बिन
न सकेगा तेरा तन भी हिल
पूछेगा रब की बता अब सोने से तू क्यों डरता है II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
काठ बांस का बुनी
लोहे की कीलो से ठुकी
खटिया पर पढ़ा, माया से घिरा
सोना, सोना, तू करता है
सत्यम शिवम् सुन्दरम न दिखा
परमात्मा का एहसास न किया
आत्मा की आवाज़ को न सुना
देख हाढ़ मॉस के पुतले को सोहना, सोहना तू करता है
मोह माया मै फंसा दुनिया को छला
किया विश्वासघात न रब से डरा
दुनिया की रंगीनियों मै फंसा
न देख असलियत को माया के अँधेरे मै सोना, सोना करता है
आयेगा एक दिन,
जब तू होगा सांस बिन
न सकेगा तेरा तन भी हिल
पूछेगा रब की बता अब सोने से तू क्यों डरता है II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
नई दुनिया
क्यों चाहते हो की आ जाउ फिर मै वापिस दुनिया मै तुम्हारी
क्यों कहते हो की करूंगा कौशिश तो जीतूगा मै बाज़ी हारी
क्यों समझते हो ऐसा की बाकि हें इस राख के ढेर मै कोई चिंगारी बाकि
क्यों मानते हो की है मुझमे जिन्दगी के लिए खुमारी अभी बाकि
समझना होगा, जानना होगा, मानना होगा तुम्हे
की खिलौना नहीं इंसान हूँ मै
कैसे बदलते है रंग, कैसे टूटते है सपने, कैसे बदलते है अपने
इन सबसे नहीं अनजान हूँ मै
जब दिल मै थे अरमान, सजाये थे सपने, बनाये थे अपने
तब विचरने वाला सपनो मै एक नादान था मै
सोचता था मै बहुत हसीन है दुनिया, सच होंगे सपने मेरे, साथ होंगे अपने मेरे
पर जब खुली आँख हुई दुनिया की पहचान तो बहुत हैरान था मै
अब चाहते हो फिर
की भूल कर फिर सब कुछ
सजाऊँ फिर सपने, बनाऊ फिर अपने,
मगर अब ऐसा भी नहीं अनजान हूँ मै
लगता है हर तरफ से घेर लिया है एक शून्य ने मुझे
चीरकर इस शून्य को न
पहुँच पाती है कोई आवाज़ मुझ तक
शायद अपने ही अस्तित्व से परेशान हूँ मै
सवेदनहीन, थका हुआ लाचार सा
जीवन की इस अँधेरी गुफा मै खढ़ा
न तो दुखी हूँ, न सुखी हूँ
बस एक निर्रथक जीवन की पहचान हूँ मै
पाना है मुझे तो आना होगा तुम्हे
दूसरी ओर इस जीवन की अँधेरी गुफा के पार
जहाँ एक नई दुनिया नए रिश्ते कर रहे होगे हमारा इंतजार
बसायेगे नए सपने, होंगे नए अरमान,जहाँ होगी अपनी एक नई पहचान II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
क्यों चाहते हो की आ जाउ फिर मै वापिस दुनिया मै तुम्हारी
क्यों कहते हो की करूंगा कौशिश तो जीतूगा मै बाज़ी हारी
क्यों समझते हो ऐसा की बाकि हें इस राख के ढेर मै कोई चिंगारी बाकि
क्यों मानते हो की है मुझमे जिन्दगी के लिए खुमारी अभी बाकि
समझना होगा, जानना होगा, मानना होगा तुम्हे
की खिलौना नहीं इंसान हूँ मै
कैसे बदलते है रंग, कैसे टूटते है सपने, कैसे बदलते है अपने
इन सबसे नहीं अनजान हूँ मै
जब दिल मै थे अरमान, सजाये थे सपने, बनाये थे अपने
तब विचरने वाला सपनो मै एक नादान था मै
सोचता था मै बहुत हसीन है दुनिया, सच होंगे सपने मेरे, साथ होंगे अपने मेरे
पर जब खुली आँख हुई दुनिया की पहचान तो बहुत हैरान था मै
अब चाहते हो फिर
की भूल कर फिर सब कुछ
सजाऊँ फिर सपने, बनाऊ फिर अपने,
मगर अब ऐसा भी नहीं अनजान हूँ मै
लगता है हर तरफ से घेर लिया है एक शून्य ने मुझे
चीरकर इस शून्य को न
पहुँच पाती है कोई आवाज़ मुझ तक
शायद अपने ही अस्तित्व से परेशान हूँ मै
सवेदनहीन, थका हुआ लाचार सा
जीवन की इस अँधेरी गुफा मै खढ़ा
न तो दुखी हूँ, न सुखी हूँ
बस एक निर्रथक जीवन की पहचान हूँ मै
पाना है मुझे तो आना होगा तुम्हे
दूसरी ओर इस जीवन की अँधेरी गुफा के पार
जहाँ एक नई दुनिया नए रिश्ते कर रहे होगे हमारा इंतजार
बसायेगे नए सपने, होंगे नए अरमान,जहाँ होगी अपनी एक नई पहचान II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
Tuesday, April 6, 2010
अपूर्ण आशा
बर्फ का एक बढ़ा हिम खंड
जो पढ़ा है बरसो से पर्वत पर
बह जाये उस पर से पानी की धार
यह हो नहीं सकता I
उद्दास बेजान नीरस सी जिन्दगी
एका एक हो जाये ख़ुशी से गुलजार
या हो जाये बिन बदल बरसात
यह हो नहीं सकता I
जानकार जीवन की सचाई
झेलकर ज़माने की रुस्बाई
करके बन्द अपनी आँख समझले हुई नहीं कोई बात
यह हो नहीं सकता I
हो बीच हमारे नफरत की दीवार
कह दे की दीखता नहीं उस पार
फिर स्थापित हो जाये कोई संवाद
यह हो नहीं सकता I
अगर कभी तुम आ जाते
अपने गर्म आंसुओ को मुझ पर गिरा जाते
और सर्द भावनाओ के हिम खंड को शायद पिघला जाते
मगर यह भी तो हो न सका I
कोई प्राण वायु अगर उन आंसुओ के झरोखे से
बहा जाती हिम खंड के नीचे से किसी गंगोत्री की धार
मगर हुई नहीं ऐसी कोई बात, नहीं बदला विधि का विधान
नहीं बही कोई प्रेम की धार और ऐसा कुछ भी हो नहीं सका II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
बर्फ का एक बढ़ा हिम खंड
जो पढ़ा है बरसो से पर्वत पर
बह जाये उस पर से पानी की धार
यह हो नहीं सकता I
उद्दास बेजान नीरस सी जिन्दगी
एका एक हो जाये ख़ुशी से गुलजार
या हो जाये बिन बदल बरसात
यह हो नहीं सकता I
जानकार जीवन की सचाई
झेलकर ज़माने की रुस्बाई
करके बन्द अपनी आँख समझले हुई नहीं कोई बात
यह हो नहीं सकता I
हो बीच हमारे नफरत की दीवार
कह दे की दीखता नहीं उस पार
फिर स्थापित हो जाये कोई संवाद
यह हो नहीं सकता I
अगर कभी तुम आ जाते
अपने गर्म आंसुओ को मुझ पर गिरा जाते
और सर्द भावनाओ के हिम खंड को शायद पिघला जाते
मगर यह भी तो हो न सका I
कोई प्राण वायु अगर उन आंसुओ के झरोखे से
बहा जाती हिम खंड के नीचे से किसी गंगोत्री की धार
मगर हुई नहीं ऐसी कोई बात, नहीं बदला विधि का विधान
नहीं बही कोई प्रेम की धार और ऐसा कुछ भी हो नहीं सका II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
जिन्दा लाश
तुमने हमारे आतम सम्मान को दिया कुचल
देकर नाम उसे हमारे अभिमान का
बढ़ा लिया अपने अभिमान को आसमान तक
ओउढ़ कर नकाब एक दीन हीन बेजुबान का
हमे तो अर्श से फर्श तक पहुंचा दिया
पर क्या कभी अपनी बेलगाम उढ़ान पर तुमने ध्यान किया
अब भी चाहते हो की लगाये कह कहे हम
जब की एक हँसते खेलते इंसान को तुमने जिन्दा लाश बना दिया
इंसान जब बदल जाता है लाश मै
तो उसमे जीवन का कोई निशान नहीं होता
उसका किसी से फिर कोई रिश्ता नहीं होता
उसका फिर कोई नाम नहीं होता
होता है तो बस एक सढ़ता हुआ शरीर
उस शरीर मै आत्मा का निवास नहीं होता
इस शरीर को तुम झुकाना चाहती थी सो झुका लिया
मगर आत्मा को ऐसे शरीर की अब जरूरत नहीं
इस शरीर को झुकाकर तुम इस शरीर से तो जीत गयी
मगर जानती हो इसकी आत्मा तुमसे हमेशा के लिए दूर चली गयी
याद रखना लाशे कभी हारा नहीं करती
और आत्माए कभी जीतने की चाह नहीं रखती II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
तुमने हमारे आतम सम्मान को दिया कुचल
देकर नाम उसे हमारे अभिमान का
बढ़ा लिया अपने अभिमान को आसमान तक
ओउढ़ कर नकाब एक दीन हीन बेजुबान का
हमे तो अर्श से फर्श तक पहुंचा दिया
पर क्या कभी अपनी बेलगाम उढ़ान पर तुमने ध्यान किया
अब भी चाहते हो की लगाये कह कहे हम
जब की एक हँसते खेलते इंसान को तुमने जिन्दा लाश बना दिया
इंसान जब बदल जाता है लाश मै
तो उसमे जीवन का कोई निशान नहीं होता
उसका किसी से फिर कोई रिश्ता नहीं होता
उसका फिर कोई नाम नहीं होता
होता है तो बस एक सढ़ता हुआ शरीर
उस शरीर मै आत्मा का निवास नहीं होता
इस शरीर को तुम झुकाना चाहती थी सो झुका लिया
मगर आत्मा को ऐसे शरीर की अब जरूरत नहीं
इस शरीर को झुकाकर तुम इस शरीर से तो जीत गयी
मगर जानती हो इसकी आत्मा तुमसे हमेशा के लिए दूर चली गयी
याद रखना लाशे कभी हारा नहीं करती
और आत्माए कभी जीतने की चाह नहीं रखती II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
हार-जीत
मैंने मान लिया की मै हार गया,
तुम खुश हो की तुम जीत गए
मगर किस कीमत पर हुआ यह खेल
लगाओं जो हिसाब तो समझ नहीं आताI
तुम जीत तो गए पर फिर भी क्या तुम खुश हो
कयोंकि न चाहते भी सोचना कभी तुम
की कैसे हराया तुमने मुझको कैसे बेचे सिदान्त अपने,
कैसे मारा अपनी अंतरात्मा कि आवाज़ कोI
फिर भी न हो कोई अपराध बोध तुमको
इसलिए चाहते हो हँसता देखना मुझको
चाहते हो देखना चेहचहता मुझको
चाहते हो की सुनाओ मिलन के तराने तुमको I
मगर शायद बावजूद हारने के
नहीं हो पायेगा यह सब मुझसे
मै सिर्फ हरा ही नहीं हूँ टूट गया हूँ
गीली लकढ़ी सा सुलग के भुझ गया हूँ I
तन नए कर दिया समर्पण सामने तुम्हरे
पर मन नए परमात्मा के समक्ष समर्पण कर दिया है
दिमाग ने छोढ़कर सोचना, सुखो को आशा छोढ़ दी है
आत्मा भी बाहर खढ़ी इस शीण होती काया की दुर्दशा देख रही है I
मै तो अपनी दुर्दशा मे भी "मै" को पहचान गया हूँ
पर क्या तुम भी तुम सब मै अपने को पहचानते हो
क्यों नहीं मानते समक्ष मेरे की तुम सब में एक तुम भी हो
कया फायेदा इस जीत का जो तुम्हे खुद से मुह छुपाने को मजबूर कर दे I
विजेता तो होता है वोह जो
कर देता है हारने वाले के शरीर और आत्मा को
मजबूर करने को समर्पण सामने अपने करके मजबूर उसके दिल को
वरना तो जीत कर भी अक्सर हार जाया करते है लोग II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
मैंने मान लिया की मै हार गया,
तुम खुश हो की तुम जीत गए
मगर किस कीमत पर हुआ यह खेल
लगाओं जो हिसाब तो समझ नहीं आताI
तुम जीत तो गए पर फिर भी क्या तुम खुश हो
कयोंकि न चाहते भी सोचना कभी तुम
की कैसे हराया तुमने मुझको कैसे बेचे सिदान्त अपने,
कैसे मारा अपनी अंतरात्मा कि आवाज़ कोI
फिर भी न हो कोई अपराध बोध तुमको
इसलिए चाहते हो हँसता देखना मुझको
चाहते हो देखना चेहचहता मुझको
चाहते हो की सुनाओ मिलन के तराने तुमको I
मगर शायद बावजूद हारने के
नहीं हो पायेगा यह सब मुझसे
मै सिर्फ हरा ही नहीं हूँ टूट गया हूँ
गीली लकढ़ी सा सुलग के भुझ गया हूँ I
तन नए कर दिया समर्पण सामने तुम्हरे
पर मन नए परमात्मा के समक्ष समर्पण कर दिया है
दिमाग ने छोढ़कर सोचना, सुखो को आशा छोढ़ दी है
आत्मा भी बाहर खढ़ी इस शीण होती काया की दुर्दशा देख रही है I
मै तो अपनी दुर्दशा मे भी "मै" को पहचान गया हूँ
पर क्या तुम भी तुम सब मै अपने को पहचानते हो
क्यों नहीं मानते समक्ष मेरे की तुम सब में एक तुम भी हो
कया फायेदा इस जीत का जो तुम्हे खुद से मुह छुपाने को मजबूर कर दे I
विजेता तो होता है वोह जो
कर देता है हारने वाले के शरीर और आत्मा को
मजबूर करने को समर्पण सामने अपने करके मजबूर उसके दिल को
वरना तो जीत कर भी अक्सर हार जाया करते है लोग II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
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