Tuesday, April 6, 2010

                                  जिन्दा लाश

तुमने हमारे आतम सम्मान को दिया कुचल 
       देकर नाम उसे हमारे अभिमान का 
          बढ़ा लिया अपने अभिमान को  आसमान तक
            ओउढ़ कर नकाब एक दीन हीन बेजुबान का

हमे  तो अर्श से फर्श तक पहुंचा दिया
   पर क्या कभी अपनी बेलगाम उढ़ान पर तुमने ध्यान किया
      अब भी चाहते हो की लगाये कह कहे हम
        जब की एक हँसते खेलते इंसान को तुमने जिन्दा लाश बना दिया

इंसान जब बदल जाता है लाश मै
  तो उसमे जीवन का कोई निशान नहीं होता
     उसका किसी से फिर कोई रिश्ता नहीं होता
        उसका फिर कोई नाम नहीं होता

होता है तो बस एक सढ़ता हुआ शरीर
  उस शरीर मै आत्मा का निवास नहीं होता
      इस शरीर को तुम झुकाना चाहती थी सो झुका लिया
          मगर आत्मा को ऐसे शरीर की अब जरूरत नहीं

इस शरीर को झुकाकर तुम इस शरीर से तो जीत गयी
   मगर जानती हो  इसकी आत्मा तुमसे हमेशा के लिए दूर चली गयी
     याद रखना लाशे कभी हारा नहीं करती
       और आत्माए कभी जीतने की चाह नहीं रखती II  

                             लेखक    प्रवीण चंदर झांजी

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