जिन्दा लाश
तुमने हमारे आतम सम्मान को दिया कुचल
देकर नाम उसे हमारे अभिमान का
बढ़ा लिया अपने अभिमान को आसमान तक
ओउढ़ कर नकाब एक दीन हीन बेजुबान का
हमे तो अर्श से फर्श तक पहुंचा दिया
पर क्या कभी अपनी बेलगाम उढ़ान पर तुमने ध्यान किया
अब भी चाहते हो की लगाये कह कहे हम
जब की एक हँसते खेलते इंसान को तुमने जिन्दा लाश बना दिया
इंसान जब बदल जाता है लाश मै
तो उसमे जीवन का कोई निशान नहीं होता
उसका किसी से फिर कोई रिश्ता नहीं होता
उसका फिर कोई नाम नहीं होता
होता है तो बस एक सढ़ता हुआ शरीर
उस शरीर मै आत्मा का निवास नहीं होता
इस शरीर को तुम झुकाना चाहती थी सो झुका लिया
मगर आत्मा को ऐसे शरीर की अब जरूरत नहीं
इस शरीर को झुकाकर तुम इस शरीर से तो जीत गयी
मगर जानती हो इसकी आत्मा तुमसे हमेशा के लिए दूर चली गयी
याद रखना लाशे कभी हारा नहीं करती
और आत्माए कभी जीतने की चाह नहीं रखती II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
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