Tuesday, April 6, 2010

                              अपूर्ण आशा
बर्फ का एक बढ़ा हिम खंड
   जो पढ़ा है बरसो से पर्वत पर
      बह जाये उस पर से पानी की धार
           यह हो नहीं सकता I

उद्दास बेजान नीरस सी जिन्दगी
  एका एक हो जाये ख़ुशी से गुलजार
       या हो जाये बिन बदल बरसात
             यह हो नहीं सकता  I

जानकार जीवन की सचाई
  झेलकर ज़माने की रुस्बाई
   करके बन्द अपनी आँख समझले हुई नहीं कोई बात
     यह हो नहीं सकता  I

हो बीच हमारे नफरत की दीवार
  कह दे की दीखता नहीं उस पार
    फिर स्थापित हो जाये कोई संवाद 
       यह हो नहीं सकता I


अगर कभी तुम आ जाते
  अपने गर्म आंसुओ को मुझ पर गिरा जाते
    और सर्द भावनाओ के हिम खंड को शायद पिघला जाते
        मगर यह भी तो हो न सका  I
 
कोई प्राण वायु अगर उन आंसुओ के झरोखे से 
  बहा जाती हिम खंड के नीचे से किसी गंगोत्री की धार 
    मगर हुई नहीं ऐसी कोई बात, नहीं बदला विधि का विधान 
    नहीं बही कोई प्रेम की धार और ऐसा कुछ भी हो नहीं सका II
 
                        लेखक प्रवीण  चंदर झांजी  
 
    

No comments:

Post a Comment