Wednesday, April 21, 2010

                               अलविदा

जिन्दगी मत कर उदास इतना की
   मै तुझसे उदास हो जाऊ
     अगर मै तुझसे उदास हो गया
         तो बहुत उदास हो जायगी तू

कभी बहुत चाहता था मै तुझे
  पर उस शिदत से न चाह पाई मुझे तू
     कभी डरता था तुझे खोने से मै
        अब मेरे खोने के  डर से क्यों डर जाती है तू 

कुछ रही  होंगी मजबुरिया तेरी   कुछ होंगे स्वार्थ तेरे
   वर्ना यह जानकर भी कि 
      नहीं रहेगा हमेशा यू साथ तेरा मेरा   
       न इस तरह  कभी दुत्कारती हमें तू

जितना भी था साथ हमारा
  काश हो जाता उसमे कुछ ऐसा
    गर्व से कह पाते हम भी
      क्या खूब जिए हम साथ तेरे

मिलना बिछढ़ ना तो है विधान विधि का
  अफ़सोस तो है यह कि  न हम खुश हो पाए तुमसे
   न तुम खुश हो पाई हमसे   कहते है अलविदा अब
     क्योंकि  छा गएहै अब  यह रात के अँधेरे II
                     लेखक प्रवीण चंदर झांजी
      
  


   

No comments:

Post a Comment