अलविदा
जिन्दगी मत कर उदास इतना की
मै तुझसे उदास हो जाऊ
अगर मै तुझसे उदास हो गया
तो बहुत उदास हो जायगी तू
कभी बहुत चाहता था मै तुझे
पर उस शिदत से न चाह पाई मुझे तू
कभी डरता था तुझे खोने से मै
अब मेरे खोने के डर से क्यों डर जाती है तू
कुछ रही होंगी मजबुरिया तेरी कुछ होंगे स्वार्थ तेरे
वर्ना यह जानकर भी कि
नहीं रहेगा हमेशा यू साथ तेरा मेरा
न इस तरह कभी दुत्कारती हमें तू
जितना भी था साथ हमारा
काश हो जाता उसमे कुछ ऐसा
गर्व से कह पाते हम भी
क्या खूब जिए हम साथ तेरे
मिलना बिछढ़ ना तो है विधान विधि का
अफ़सोस तो है यह कि न हम खुश हो पाए तुमसे
न तुम खुश हो पाई हमसे कहते है अलविदा अब
क्योंकि छा गएहै अब यह रात के अँधेरे II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
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