हार-जीत
मैंने मान लिया की मै हार गया,
तुम खुश हो की तुम जीत गए
मगर किस कीमत पर हुआ यह खेल
लगाओं जो हिसाब तो समझ नहीं आताI
तुम जीत तो गए पर फिर भी क्या तुम खुश हो
कयोंकि न चाहते भी सोचना कभी तुम
की कैसे हराया तुमने मुझको कैसे बेचे सिदान्त अपने,
कैसे मारा अपनी अंतरात्मा कि आवाज़ कोI
फिर भी न हो कोई अपराध बोध तुमको
इसलिए चाहते हो हँसता देखना मुझको
चाहते हो देखना चेहचहता मुझको
चाहते हो की सुनाओ मिलन के तराने तुमको I
मगर शायद बावजूद हारने के
नहीं हो पायेगा यह सब मुझसे
मै सिर्फ हरा ही नहीं हूँ टूट गया हूँ
गीली लकढ़ी सा सुलग के भुझ गया हूँ I
तन नए कर दिया समर्पण सामने तुम्हरे
पर मन नए परमात्मा के समक्ष समर्पण कर दिया है
दिमाग ने छोढ़कर सोचना, सुखो को आशा छोढ़ दी है
आत्मा भी बाहर खढ़ी इस शीण होती काया की दुर्दशा देख रही है I
मै तो अपनी दुर्दशा मे भी "मै" को पहचान गया हूँ
पर क्या तुम भी तुम सब मै अपने को पहचानते हो
क्यों नहीं मानते समक्ष मेरे की तुम सब में एक तुम भी हो
कया फायेदा इस जीत का जो तुम्हे खुद से मुह छुपाने को मजबूर कर दे I
विजेता तो होता है वोह जो
कर देता है हारने वाले के शरीर और आत्मा को
मजबूर करने को समर्पण सामने अपने करके मजबूर उसके दिल को
वरना तो जीत कर भी अक्सर हार जाया करते है लोग II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
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