"नित्य"
कौन कहता है की निराश हूँ मैं
न होना किसी आशा का नहीं होता निराशा
न पूरा होना किसी आशा का होती है निराशा
नहीं है आशा इस दुनिया से कोई
जिससे है उससे हुई पूरी या रही अधूरी
लगेगा पता यह मेरे मरने के बाद
फिर भला कैसे हो सकता हूँ मै निराश
कौन कहता है की उदास हूँ मैं
जब होगी आशा किसी ख़ुशी की
तभी तो होऊँगा मैं उदास
जब आशा ही नहीं
तो फिर ख़ुशी कैसी
जब ख़ुशी ही नहीं
तो फिर उदासी कैसी
कौन कहता है की बर्बाद हूँ मै
बर्बाद तो होता है वह
जो कि आबाद होता है
आबाद वह होता है
जिसके पास कुछ "नित्य" होता है
पर है कुछ इस दुनिया मै "नित्य" यहाँ
यह शरीर है हो जायेगा ख़तम मृत्यु के साथ
करम जल जायेगा भोग के साथ
तो फिर क्या है यहाँ "नित्य" किसी के पास
जब कोई भी नहीं आबाद यहाँ
तो क्यों कहते हो की बर्बाद हूँ मै
न उदास हूँ, न निराश हूँ, न बर्बाद हूँ मै
हाँ चल पढ़ा हूँ जिस पर वह आसान नहीं है राह
अब झूठ, परपंच, फरेब की दुनिया की नहीं है चाह
अब तो जाना चाहता हूँ उस ओर सब कुछ है "नित्य" जहाँ II
लेखक प्रवीण चंदर झांझी
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