नई दुनिया
क्यों चाहते हो की आ जाउ फिर मै वापिस दुनिया मै तुम्हारी
क्यों कहते हो की करूंगा कौशिश तो जीतूगा मै बाज़ी हारी
क्यों समझते हो ऐसा की बाकि हें इस राख के ढेर मै कोई चिंगारी बाकि
क्यों मानते हो की है मुझमे जिन्दगी के लिए खुमारी अभी बाकि
समझना होगा, जानना होगा, मानना होगा तुम्हे
की खिलौना नहीं इंसान हूँ मै
कैसे बदलते है रंग, कैसे टूटते है सपने, कैसे बदलते है अपने
इन सबसे नहीं अनजान हूँ मै
जब दिल मै थे अरमान, सजाये थे सपने, बनाये थे अपने
तब विचरने वाला सपनो मै एक नादान था मै
सोचता था मै बहुत हसीन है दुनिया, सच होंगे सपने मेरे, साथ होंगे अपने मेरे
पर जब खुली आँख हुई दुनिया की पहचान तो बहुत हैरान था मै
अब चाहते हो फिर
की भूल कर फिर सब कुछ
सजाऊँ फिर सपने, बनाऊ फिर अपने,
मगर अब ऐसा भी नहीं अनजान हूँ मै
लगता है हर तरफ से घेर लिया है एक शून्य ने मुझे
चीरकर इस शून्य को न
पहुँच पाती है कोई आवाज़ मुझ तक
शायद अपने ही अस्तित्व से परेशान हूँ मै
सवेदनहीन, थका हुआ लाचार सा
जीवन की इस अँधेरी गुफा मै खढ़ा
न तो दुखी हूँ, न सुखी हूँ
बस एक निर्रथक जीवन की पहचान हूँ मै
पाना है मुझे तो आना होगा तुम्हे
दूसरी ओर इस जीवन की अँधेरी गुफा के पार
जहाँ एक नई दुनिया नए रिश्ते कर रहे होगे हमारा इंतजार
बसायेगे नए सपने, होंगे नए अरमान,जहाँ होगी अपनी एक नई पहचान II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
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