Tuesday, May 18, 2010

वो सुबह

मेरी ख़ामोशी ही मेरी जुबान है
    वर्ना बहुत बोलकर भी अक्सर
      कुछ कह नहीं पाते लोग,

मेरी सादगी ही मेरी पहचान है
  वर्ना बहुत कुछ कर के भी
    पहचान नहीं बना पाते लोग,

मेरी नज़र ही मेरी उदासीनता का
निशान है वर्ना बहुत रोकर भी
              जीवन से  मुह नहीं मोढ़ पाते लोग,

मेरे कर्म ही मेरे वैराग्य कि पहचान है
  वर्ना पहनकर गेरुआ भी
     दुनिया से मुह नहीं मोढ़ पाते लोग,

है परेशानी नहीं लोगो कि के दुखी है वो 
     अक्सर दुसरो के सुख से 
       भी दुखी हो जाते है लोग, 

अपने गरेबान कि धूल पर
   नहीं नज़र डालते लोग 
     दूसरो के घरो मै अक्सर झांकते है लोग

होता है मतलब जब अपना
   तो दूंढ लेते है पाताल मै भी
   वर्ना सामने होकर भी नहीं पहचानते लोग,

मरने पर दूसरो के जताते है शोक
  आनी है बारी भी अपनी
   यह जानकर भी नहीं जानना चाहते लोग

देखकर कालिमा इस जीवन कि रात कि
  क्यों घबरा जाते है, होगी फिर नई सुबह
     यह क्यों भूल जाते है लोग II

लेखक प्रवीण चंदर झांजी
  

No comments:

Post a Comment