पहला और आखरी सत्य
मेले में घर बनाना चाहते हो
रौशनी से आंगन सजाना चाहते हो
ओर चाहते हो की बनी रहे यह रौनक हमेशा
खुशिओ की रेत से आँचल भरना चाहते हो
कभी सोचा है की
है यह मेला चार दिन का
न फिर होंगे तम्बू, न होगी रोशिनी
न होंगी महफ़िल न होगी रौनक
चल देगा कारवां जिन्दगी
जब छोढ़ कर तनहा तुझको
खढ़ा होगा अकेला जब तू
जिन्दगी के आखरी छोर पे
जानते है सब ये,
मानते है सब ये
जानकार भी मानकर भी
नहीं चाहते समझना ये
न समझकर इसको
बच पायेगा क्या कोई इस से
है जीवन का यह भेद ऐसा
उलझा हुआ है हर कोई इसमें
जिस दिन इन्सान यह समझ जायेगा
झूठ, फरेब अपने पराये का भेद वो भूल जायेगा
समझ जायेगा यह पहला ओर आखरी सत्य
की अकेला आया है अकेला ही जायेगा II
लेखक प्रवीण चंदर झांजी
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