Sunday, May 9, 2010

                      पहला और आखरी सत्य

मेले में घर बनाना चाहते हो
  रौशनी से आंगन सजाना चाहते हो
    ओर चाहते हो की बनी रहे यह रौनक हमेशा
       खुशिओ की रेत से आँचल भरना चाहते हो

कभी सोचा है की
 है यह मेला चार दिन का
   न फिर होंगे तम्बू, न होगी  रोशिनी
    न होंगी महफ़िल न होगी रौनक

चल देगा कारवां जिन्दगी
  जब छोढ़ कर तनहा तुझको 
    खढ़ा होगा अकेला जब तू
      जिन्दगी के आखरी छोर पे 

जानते है सब ये,
   मानते है सब ये
  जानकार भी मानकर भी
        नहीं चाहते समझना ये
   

न समझकर इसको
 बच पायेगा क्या कोई इस से
     है जीवन  का यह भेद  ऐसा
      उलझा हुआ है हर कोई इसमें

जिस दिन इन्सान यह समझ जायेगा
   झूठ, फरेब अपने पराये का भेद वो  भूल जायेगा
      समझ जायेगा यह पहला ओर आखरी सत्य
       की अकेला आया है अकेला ही जायेगा II

               लेखक प्रवीण चंदर झांजी  

No comments:

Post a Comment